Kashmir…


मैं आज़ाद था जब तक मुझे नहीं डराया था,

तुम्हारी धमकियों ने हमारे रिशते की नीव को ठुकराया था,

जिससे मज़बूर हो कर मैने कहीं और हाथ बढ़ाया था,

मेरी वादीयो मै तुमने लाल रंग को इस तरह बिछाया था कि मेरे दोस्तो न मुझे सफेद चोला ओढ़या था,

मैंने भी एक दोस्त तब बनाया था …





हम भुले नहीं उन आंसुओ की बारिश जिससे तुमने हमारे बच्चों की लशो को बहाया था,
और
मेरे “कश्मीर” की “वाडियो को भी नहलाया था,
मेरी बिखरी बाहों को भारत ने संभाला था,
मैंने भी एक दोस्त तब बनाया था…





मेरी भूमि के दो हिस्से तुम्हारे फितूर ने करवे थे,
और बिना किसी गीले शिकवे के दर्द मुस्कुरा कर हमने उठाये थे..
आज जब पुराने किस्से दोहरते है तो हमारे सैलाब को घर जाने की खुशी से भुला देते है,
अब घर लोटने का वक़्त है आंखो मे पुरानी यादें है,
मेरी तकलीफ़ो को तवाज्जो देने वाले मेरा भारत महान है…





धन्यवाद

-विशाखा मलिक


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